पश्चिम में एक कहावत है कि “ पहले दुश्मन को बुरा नाम दो और फिर उसे मार दो ! “ ऐसा कुछ ही मुस्लिम इतिहासकारों ने किया ! उन्होंने सिंध के आखिरी हिन्दू राजा को बदनाम करने में कोई कसर न छोड़ी , क्यूंकि उस हिन्दू राजा ने अकेले अपनी दम पर 32 वर्षों तक मुस्लिम आक्रान्ता मोहम्मद बिन कासिम को सिंध से आगे नहीं बढ़ने दिया !
उन्होंने पुष्करणा ब्राह्मण राजा को बदनाम करने के लिए अपनी ही बहन से विवाह करने के मनगढंत किस्से लिखने शुरू किये ! अब अगर कोई हिन्दू धर्म को समझता है तो वो समझ सकता है कि अपनी ही बहन से विवाह करना हिन्दू धर्म की नही दुसरे धर्मों की प्रथा है और ये मुस्लिम इतिहासकारों का सफेद झूठ था, उनको आने वाले समय में बदनाम करने के लिए !
इन इतिहासकारों ने एक और झूठ फैलाया कि ये महान हिन्दू राजा हर रात को एक नवयौवना (कुंवारी लड़की) का बलात्कार करता था ! 32 वर्षों तक राजधर्म का पालन करने वाले राजा के बारे में ये भी महज़ एक झूठ था !]
हिन्दू इतिहास पर गौर किया जाए तो पुण्य सलिला सिंध भूमि वैदिक काल से ही वीरों की भूमि रही है ! वेदों की ऋचाओं की गूंज इस पवित्र भूमि पर बहने वाली सिंधु नदी के किनारों पर हुई ! इसी पवित्र भूमि पर पौराणिक काल में कई वीरों व वीरांगनाओं को जन्म दिया है ! जिनमें त्रेता युग में महाराज दशरथ की पत्नी कैकेयी और द्वापर युग में महाराजा जयदरथ का नाम भी शामिल है !
महाराजा दाहिर को 7 राज्य की सत्ता संभालते समय ही कई प्रकार के विरोधों का सामना करना पड़ा ! उस समय गुर्जर, जाट और लोहाणा समाज उनके पिता द्वारा किए गए शासन से नाराज थे, तो ब्राह्मण समाज बौद्ध धर्म को राजधर्म घोषित करने के कारण नाराज थे ! मगर राजा दाहिर ने सभी समाजों को अपने साथ लेकर चलने का संकल्प लिया ! आगे चलकर महाराजा दाहिर ने सिंध का राजधर्म सनातन हिन्दू धर्म को घोषित कर ब्राह्मण समाज की भी नाराजगी दूर कर दूरदर्शिता और धर्मनिष्ठा का परिचय दिया !
दाहिर की पत्नी ने कई दूसरी महिलाओं के साथ जौहर कर लिया ताकि कोई भी अरबी म्लेक्ष उनके मृत शरीर से भी बलात्कार न कर सके !
मुस्लिमों को भी राजा दाहिर के बारे में मालूम होना आवश्यक है एवं उनका शुक्रगुजार भी होना चाहिए कि उन्होंने पैगम्बर मोहम्मद के भागे हुए परिवार को खतरनाक उमायादों से बचाते हुए अपने पास रहने का स्थान दिया !
राजा दाहिर ने अपने महल में इमाम हुसैन के अनुयायी मुहम्मद बिन अल्लाफी को रहने की जगह दी ! उस समय अल्लाफी को उमायाद जान से मार देने के लिए तलाश रहे थे क्योंकि अल्लाफी अहल-ए-बैत (पैगम्बर मोहम्मद का सीधा खून) का आखिरी वंशज था !
यही नही राजा दाहिर ने पैगम्बर मोहम्मद के पौते हुसैन को भी शरण देने की पेशकश की थी ! मगर जब हुसैन शरण के लिए बढ़ रहा था, उसे कर्बला इराक में बंदी बना लिया गया और बाद में कड़ी यातनाएं देते हुए मार दिया गया !
राजा दाहिर एक महान हिन्दू शासक थे जिहोने युद्ध क्षेत्र में लड़ते हुए प्राण न्योछावर किये यह भयंकर युद्ध सन 712 ई. में हुआ था इस युद्ध में राजा दाहिर के साथियों ने ही उन्हें छल-कपट से मार दिया था ! उनकी सुंदर बेटियों को इस्लामी परंपरा के तहत युद्ध में लूट के रूप में कब्जा लिया गया ! अरब से भारत लूट के इरादे से आये मुहम्मद बिन कासिम ने उनकी बेटियों को उस समय के खलीफा सुलेमान बिन अब्द अल मलिक के सामने उपहार के रूप में भेजा !
अंत में उनकी ही बेटियों ने पहले सूझ बूझ और अक्लमंदी से खलीफा के हाथों मुहम्मद बिन कासिम को मरवा कर अपना बदला लिया और बाद में खुद को खलीफा से बचाते हुए एक दुसरे को ही मार दिया !
स्वतंत्र भारत का दुर्भाग्य है कि पराक्रमी राजा दाहिर का नाम भी हममें से अधिकाँश नहीं जानते ! इतिहासकारों ने भी उनके साथ न्याय नहीं किया ! अपने साथियों के ही धोखे का शिकार हुए राजा दाहिर की मृत्यु के बाद ही आतताई मोहम्मद बिन कासिम देश में घुस पाया था !
सन 715 ई.
दमिश्क के राजपथ पर सत्रह और सोलह वर्ष आयु की दो बालिकाओं को घोड़े में बांध कर घसीटा जा रहा था। घोड़े जब उछलते तो दोनों बालिकाओं का शरीर हवा में उछल जाता, और फिर धड़ाम से भूमि पर गिरता। दोनों का शरीर पीड़ा से चीख उठता, पर दोनों के मुख पर एक अद्भुत मुस्कुराहट पसर जाती, गर्व से उनका मस्तक चमक उठता। धीरे धीरे दोनों की मुस्कान मंद होने लगी, शरीर निस्तेज होने लगा। कुछ पल पश्चात दोनों के शरीर निर्जीव हो गए। मृत शरीरों को कुत्तों के आगे फेंक दिया गया, वे माँस नोच कर खाने लगे…
सिन्धु नरेश दाहिर के दो पुत्र जयसिंह और जयवर्धन ब्राह्मणवाद और आरोर पर शासन करते थे। रावर के युद्ध में महाराज दाहिर की पराजय के बाद मोहम्मद बिन कासिम ब्राह्मणवाद की ओर बढ़ा। ब्राह्मणवाद में जयसिंह की सेना ने पूरी शक्ति के साथ युद्ध किया, किन्तु अल्प सैन्यबल और कासिम की सशक्त अश्व सेना के कारण पराजय मिली। कासिम की सेना ने अपना संस्कार दिखाया, और आरोर की हजारों नारियां और बालिकाएं बन्दी बना ली गईं। साथ ही बन्दी हुईं महाराज दाहिर की छोटी पत्नी महारानी लाड़ी, और उनकी पुत्रियां सूर्या देवी और परमाल देवी। अरब के लिए स्त्री सदैव “सेक्स ऑब्जेक” रही है, कासिम की सेना ने सामान्य स्त्रियों को अपनी वासनापूर्ति हेतु बांट लिया और राजपरिवार की स्त्रियों को खलीफा के पास उपहार के रूप में भेज दिया गया।
कई मास पश्चात जब देवल, निरून, मुल्तान, ब्राह्मणवाद, आरोर, सेहवान, सीसम और रावर के मंदिरों से लुटे गए सैकड़ों टन स्वर्ण के साथ सौ स्त्रियां दश्मिक पहुँची तो उन्हें खलीफा ‘सुलेमान-बिन-अब्द-अल-मलिक’ की सेवा में प्रस्तुत किया गया। अरब की संस्कृति में स्त्रियां मात्र “औरत” होती हैं, माँ, बेटी, बहन जैसे पवित्र सम्बन्ध नहीं। सत्तर वर्ष के बूढ़े खलीफा के लिए भी स्त्रियां भोग्या ही थीं, सो खलीफा ने मुस्कुरा कर कहा- “कासिम ने हमें बड़ा ही खूबसूरत तोहफ़ा भेजा है, हम उसके शुक्रगुजार हैं। शहजादियों को हमारे हरम में भेज दिया जाय।”
खलीफा के आदेश का पालन होता, किन्तु तभी राजकुमारी सूर्या देवी ने आगे बढ़ कर कहा- “हम आपको स्वीकार नहीं कर सकते महाराज! कासिम हमें भ्रष्ट कर चुका है।”
खलीफा क्रोध से उबल पड़ा- क्या कह रही हो लड़की? कासिम ऐसा कैसे कर सकता है?
परमाल ने आगे बढ़ कर कहा- “राजकुमारी ठीक कह रही हैं महाराज! आपके पास भेजने के पूर्व कासिम ने हमे अपवित्र किया है, आप चाहें तो हमारे शरीर पा सकते हैं पर हमारी आत्मा मर चुकी है।”
खलीफा ने हाथ पटक कर कहा,” कासिम ने हमें अपना “जूठा” उपहार भेजा, उसे इसकी सजा भुगतनी ही होगी। उसे हिन्द से वापस बुलाया जाय और उसकी खाल में भूसा भर के दरबार में पेश किया जाय… हिन्द से आई औरतों को कनीज़ों में शामिल कर लिया जाय।”
इधर भारत में कासिम मुल्तान तक बढ़ चुका था। लूट में उसे इतना धन प्राप्त हो चुका था कि वह अब सम्पूर्ण भारत पर शासन के स्वप्न देखने लगा था। अब उसका लक्ष्य था कन्नौज, जिसको जीतने के लिए उसने अपने सेनापति अबुहाकिम के नेतृत्व में दस हजार की अश्वरोही सेना बनाई। पर अभी वह अपनी सेना को कन्नौज भेज पाता तबतक उसे खलीफा का सन्देश मिला कि भारत विजय के लिए उसके सम्मान में एक भव्य आयोजन किया जा रहा है, जिसमें उसे अवश्य उपस्थित रहना है। खलीफा की आज्ञा को टाल सकने की सामर्थ्य कासिम जैसे दास में नहीं थी, वह अगले दिन ही दश्मिक के लिए चल पड़ा।
कासिम जब दमिश्क पहुँचा तो खलीफा से मिलने के पूर्व ही उसे बन्दी बना लिया गया, और उसकी हत्या कर दी गयी। उसकी खाल में भूसा भर कर राजदरबार में प्रस्तुत किया गया। खलीफा के सामने जब उसका शव लाया गया तो खलीफा खिलखिला उठा था। उसने आदेश दिया कि सिन्धु राजकुमारियों को दरबार में लाया जाय।
राजकुमारियां दरबार में आईं तो पागलों की भांति हँस रही थीं। आश्चर्यचकित खलीफा ने क्रोध से गरजते हुए पूछा- “हँस क्यों रही हो?”
दोनों ने एक ही साथ उत्तर दिया- भारत की असंख्य निर्दोष प्रजा के हत्यारे को उसका दण्ड मिल चुका खलीफा, अब हँसे न तो क्या करें? इसने हमें भ्रष्ट नहीं किया था, पर इसे दण्ड देने के लिए हमें झूठ बोलना पड़ा।
खलीफा जैसे तड़प उठा। गरजा- तुम हिन्दू तो झूठ नहीं बोलते, फिर यह क्या था?
सूर्या ने मुस्कुरा कर कहा- कासिम जैसे अधर्मियों को दण्डित करने के लिए बोला गया असत्य भी पवित्र है खलीफा! नैतिकता सज्जनों के समक्ष शोभती है, अधर्मियों के समक्ष नहीं।
खलीफा ने चिढ़ कर आदेश दिया- इन्हें बन्दी बना लिया जाय, इनके अपराध की सजा हम बाद में तय करेंगे।
सैनिक खलीफा के आदेश को पूरा करने के लिए आगे बढ़े, पर राजकुमारियों ने अपने वस्त्रों में छिपाया कटार निकाला और अपने-अपने पेट मे भोंक लिया।
खलीफा चिल्लाया- इन्हें घोड़े से बांध कर घसीटा जाय। तबतक, जबतक कि खाल न उतर जाय…
खलीफा के आदेश का पालन हुआ, पर राजकुमारियों ने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया था।
हजारों वर्ष बीत गए, इतिहास जब भी दाहिर की पुत्रियों का स्मरण करता है तो गर्व से कहता है-“क्षत्रिय कंगन की सामर्थ्य क्षत्रिय तलवार से तनिक भी कम नहीं।”
राजा दाहिर , सिंध और सिंध की प्रजा के साथ जो हुआ वो कोई विरली घटना न थी
आगे पढ़िये
*मुगलों का रक्तरंजित हवसभरा इतिहास-*
1. *आठवीं सदी में मुहम्मद बिन क़ासिम* का जिहादी जंगी जुनून, काफ़िर राजा दाहिर का कटा सर, इराक़ में हज्जाज इब्न यूसुफ़ के हरम में दाहिर की बेटियों के कुचले हुए जिस्म, लड़ाई के बाद सिंध में सड़कों पर सड़ती काफ़िरों की लाशें, अधमरे सैनिकों की दिल चीर देने वाली चिंघाड़, क़ासिम के जिहादियों के चंगुल में आयीं हज़ारों काफ़िर औरतें, उनकी बोटी बोटी नोचे जाने से उठी चीत्पुकार, १०-१० जिहादियों के नीचे फँसी उस माँ को जिसके दुधमुँहे बच्चे को अल्लाहु अकबर के नारे के साथ भाले की नोक पर घुसा कर हवा में उछाल दिया गया था, उस माँ को जो यह नहीं जान पा रही थी कि कौन सी तकलीफ़ ज़्यादा बड़ी है- एक साथ १० हैवानों के बीच अपने जिस्म को नुचवाना या अपने बच्चे को भाले की नोक पर लटके हुए देखना या उस जिगर के टुकड़े को आख़िरी आशीर्वाद भी नहीं दे पाना।
2. *ग्यारहवीं सदी के पहले साल से ही महमूद ग़जनवी* के जंगी दस्ते, १/२/३/१७ बार सोमनाथ मंदिर का विध्वंस, करोड़ों हिंदुओं की आस्था का प्रतीक ज्योतिर्लिंग जो अब टुकड़े टुकड़े होकर जिहादियों के क़दमों में पड़ा था, हज़ारों सर जो धड़ों से जुदा करके खेतों में फेंक दिए गए, पेशावर, मुल्तान, लाहौर, के वो जले हुए शहर, उनमें भुट्टों की तरह भून दिए गए बुतपरस्त काफ़िर।
3. *बारहवीं सदी के वो गुरु चेले- ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती और मुहम्मद गौरी,* राजा पृथ्वीराज के राज्य में उसी के टुकड़ों और दया पर पलने वाले चिश्ती के ख़्वाब में आए इस्लामी नबी, उसका हिन्दुस्तान पर हमला करके बुतपरस्त काफ़िरों को सबक़ सिखाने के लिए गौरी को चिट्ठी, पहली लड़ाई में पृथ्वीराज के सामने घुटनों पर आकर सिर झुकाने वाले गोरी का अगली बार फिर से झपटना, और अपनी जान बख़्शने वाले के सर को अपने मुल्क ले जाकर क़िले के दरवाज़े पर टाँग देना, उसके साथ हुआ अल्लाहु अकबर का अट्टाहस, हिन्दुस्तान में मूर्तिपूजकों के ख़ून से घुटनों तक दरया बहाने के गुरु चेलों के मंसूबे और कत्लेआम।
4. *तेरहवीं सदी में बख़्तियार ख़िलजी का हमला*। नालंदा और विक्रमशिला के महीनों तक धूँ धूँ करके जलते भवन, तकबीर के नारों और फ़तह के जश्न के शोर के बीच मौत के आग़ोश में समा गए हज़ारों आचार्य, शिक्षक, शिष्य, मर्द, औरत, बच्चे।
5. *चौदहवीं सदी में महारानी पद्मिनी को पाने के लिए अलाउद्दीन ख़िलजी का चित्तौड़ का हमला,* शादीशुदा माँ समान रानी को अपने बिस्तर में देखने के जिहादी मंसूबे, हज़ारों महारानियों, रानियों, राजकुमारियों, और साथी स्त्रियों की सामूहिक पूजा, पूरा शृंगार करके आरती अर्चना, भीमकाय क़िले के बीचोंबीच हज़ारों मन लकड़ियों को इकट्ठा करते शाही हाथी, अहाते के चारों तरफ़ उन लकड़ियों को जमता देखती कन्याओं की टोली, प्रचण्ड आग में कूदने के पहले एक दूसरे से आख़िरी गले मिलना, धर्म की विजय की कामना करते हुए महारानी पद्मिनी का अग्निकुण्ड में प्रवेश, एक पल में लकड़ी को कोयला कर देने वाली दहकती आग में माँ समान कोमल महारानी और हज़ारों स्त्रियों का अंतिम प्रयाण, मर कर भी किसी जिहादी के हाथ ना आने का अतुल्य संतोष, मर कर भी सम्मान नहीं मरने देने का सुख, आने वाली पीढ़ी के वीर पुत्र अपनी जलती माताओं का प्रतिशोध ज़रूर लेंगे, इस संदेश के साथ उस ऊँची उठती आग में धुआँ हो जाने वाली राजमाताएँ और पुत्रियाँ।
*इसी सदी में काफ़िरों के कटे सरों की मीनारें बनाने वाला तैमूर*, दिल्ली शहर का वो कत्लेआम, दहाईयों तक इंसानी वजूद से ख़ाली हो जाने वाले शहर, गिद्ध, चील, भेड़ियों और जानवरों के शोर में ढके हुए शहर, क़रीब २ करोड़ इंसानों के क़ातिल का दिल्ली की गलियों में बेख़ौफ़ घूमना, पूरी दुनिया की इंसानी आबादी के ५% हिस्से को अपनी तलवार से ख़त्म करने वाले उस लंगड़े के चेहरे के भद्दे चेचकी दाग़।
6. *सोलहवीं सदी के मुग़ल बाबर के हाथों से काटे गए हज़ारों सरों की मीनारों के जुलूस,* मीनारों के ख़ौफ़ से पूरे के पूरे शहरों का इस्लाम क़ुबूल करना, बाजौड़ की औरतों की दर्दनाक दास्ताँ, बाबर के हरम से हर रात निकलने वाली कमसिन बच्चों की चीख़ें, अफ़ीम के नशे में सर काटने की प्रतियोगिता। करोड़ों हिंदुओं के भगवान राम के मंदिर का ज़मीन में दफ़न किया जाना।
*इसी सदी में बाबर के पोते अकबर* का अपने उस्ताद बैरम खाँ को फ़ारिग़ करके माँ समान उसकी बीवी से निकाह, चित्तौड़ के क़ब्ज़े के दिन ३०,००० बेगुनाह औरतों, बच्चों, बूढ़ों और जवानों का अपने हाथों से कत्लेआम, सैंकड़ों राजस्त्रियों का जौहर की आग में फिर से पलायन, ५,००० काफ़िर औरतों और बच्चों से भरा हुआ हरम, रिश्ते में बेटी, पोती और बहू लगने वाली औरतों/बच्चों की दर्दनाक चीख़ों से भरी हुई हरम की रातें।
7. *सत्रहवीं सदी में अकबर के बेटे जहांगीर का हिंदू-सिखों के गुरु अर्जन देव जी को इस्लाम क़ुबूल करने का हुक्म*, गुरु का इनकार, गुरु की मौत का फ़रमान, जलते लोहे के तवे पर गुरु का बैठना, ऊपर से गरम रेत से बदन को छलनी करना, भालों से गुरु का माँस उतारना, बादशाह जहांगीर का आख़िरी बार इस्लाम क़ुबूल करने का हुक्म? गुरु का आख़िरी इनकारी जवाब, गुरु को उनकी गाय माता की खाल में सिल कर मारने का फ़रमान, इस पर गुरु का रावी नदी में स्नान के लिए जाना और फिर कभी वापस नहीं आना।
*इसी सदी में अकबर महान के पड़पोते औरंगज़ेब के हाथों इस्लाम क़ुबूल नहीं करने पर लाखों हिंदुओं का कत्लेआम*।हज़ारों मन्दिरों को ज़मींदोज़ करके मूर्तिपूजक हिंदुओं को असली खुदा की ताक़त का एहसास करवाना, हिंदू-सिखों के गुरु तेग़ बहादुर जी को इस्लाम क़ुबूल नहीं करने पर क़त्ल का फ़रमान, दिल्ली की धरती पर गुरु का उड़ता हुआ सर, भाई मति दास का आरे से चीरा गया बदन, भाई सती दास का रुई में लपेट कर जलाया गया जिस्म, भालों पर झूलते ७०० सिखों के कटे सर, दिल्ली में कटे सरों के जुलूस, छत्रपति शिवाजी महाराज के बेटे छत्रपति संभाजी की यातनाओं के २० दिन, इस्लाम नहीं क़ुबूल करने के लिए ख़ंजर से निकाली गयीं आँखें, अल्लाहु अकबर नहीं बोलने के लिए खींची गयी ज़बान, उँगलियों के खींचे गए नाख़ून, पत्थरों से कुचली गयीं उँगलियाँ, चिमटों से खींची गयी जिस्म की खाल, ख़ंजरों से काटी गयी बोटी बोटी, तलवार से कलम किया गया सर।
8. *अठारहवीं सदी में हिंदू-सिखों के दसवें गुरु गोबिन्द सिंह जी के ५ और ८ साल के छोटे छोटे बच्चों का अपहरण*- उन्हें इस्लाम क़ुबूल करने का हुक्म, बच्चों का इनकार, दीवार में ज़िंदा चिनवाए गए बच्चे, अल्लाहु अकबर का शोर। बच्चों के बलिदान का बदला लेने वाले बंदा वैरागी का दिल्ली आना, शेर के पिंजरे में उसे क़ैद करके दिल्ली शहर में घुमाना, दुधमुँहे बच्चे का माँस ख़ंजर से निकाल के पिता बंदा के मुँह में ठूँसना, इस्लाम क़ुबूल नहीं करने पर बदन के टुकड़े टुकड़े दिल्ली की सड़कों पर। देवी के अपमान पर पैग़म्बर का अपमान करने के जुर्म में १४ साल के बालक हक़ीक़त राय का लाहौर में माँ की आँखों के सामने तन से जुदा सर। इतना सुनना था कि खाने की मेज़ पर रोटी के निवाले हलक में अटक गए। रूँधे हुए गले से रोटी नीचे नहीं उतरती थी। भाई, ये सब क्या था? अगर ये सब सच है तो हमने स्कूल में ये सब क्यों नहीं पढ़ा? १४ आँखों से आँसू लुढ़क रहे थे। कमरे में ख़ामोशी ही ख़ामोशी थी जो ७ लोगों के सुबकने से टूट रही थी।
*एक सवाल मन में कौंध रहा था, क्या कारण है कि जिस देश में पिछले १३ सदियों का एक एक साल ख़ून में डूबा हो, एक भी सदी बिना औरतों, बच्चों, माँओं की अगणित चीख़ पुकार सुने बिना नहीं बीती, जिस देश में आज भी उन १३०० सालों के हमलावरों, माओं को नंगा घुमाने वालों, उनको अरब की ग़ुलाम मंडियों में बेचने वालों, बलात्कार करने वालों, लाखों मंदिरों-मूर्तियों को तोड़ कर उन पर मस्जिद बनाने वालों, करोड़ों लोगों को तलवार के ज़ोर पर हिंदू से मुसलमान बनाने वालों को हीरो, वली और इस्लाम का ग़ाज़ी समझा जाता हो, ग़ज़नी, बाबर और औरंगज़ेब के नाम की मस्जिदें बनाकर उनमें बैठ कर करोड़ों हिंदुओं के ज़ख़्मों पर दिन में ५ बार, सप्ताह में ३५ बार, महीने में १५० बार और साल में १८२५ बार नमक मिर्च रगड़ा जाता हो, जिस देश में बलात्कारी बाबर के नाम की मस्जिद के लिए लाखों लोग सड़कों पर उतर आते हों, औरंगज़ेब के नाम की मस्जिद से दिल्ली में तकारीर की जाती हों, जिस देश को ७० साल पहले इन्हीं क़ातिल लुटेरों के मानने वालों ने दो टुकड़े कर के फेंक दिया*
*जिस देश के टुकड़े होने के बाद भी बचे खुचे पर शरीयत के काले क़ानून के साये हैं, जिस देश के २०% लोग देश का क़ानून मानने से इनकारी हों, मज़हब मुल्क से ऊपर है, इस बात का खुल्लम खुल्ला एलान करते घूमते हों, जिस देश में ६०० में से ८६ जिलों में ऐसे लोगों की संख्या २०% के पार हो चुकी हो, जिस देश में हिंदू को कश्मीर से साफ़ किया गया हो, राजधानी दिल्ली से १०० किलोमीटर दूर कैराना में हिंदुओं का पलायन किया जा चुका हो, मेरठ, मुज़फ़्फ़रनगर, सहारनपुर, बुलन्दशहर, रामपुर, मुरादाबाद आदि में पलायन की तैयारी हो चुकी हो, जिस देश में बचे खुचे हिंदू ८ राज्यों में अल्पसंख्यक बन चुके हों, जिस देश के स्कूलों में रमज़ान के दिनों में हिंदू बच्चों के लिए भी खाने पर पाबंदी लगनी शुरू हो गयी हो, जिस देश की राजधानी में हनुमान आरती को रमज़ान के महीने में रुकवा दिया गया हो क्योंकि मूर्तिपूजा से मोहल्ले के लाखों अल्पसंख्यक लोगों की धार्मिक भावनाएँ आहत हो जाती हैं, जिस देश में आपके लिए घेरा तंग से तंगतर होता जा रहा हो, उस देश के युवाओं की समस्या क्या हैं? भ्रष्टाचार,बेरोजगारी, ग्लोबल वार्मिंग, गोरक्षक, आतंकवाद,या इन सबसे बढ कर स्वंय की अस्तित्व ?*
(दाहिर की जाति पर विवाद हो इससे पूर्व कह देना चाहता हूँ, कि मेरे लिए हर वह व्यक्ति क्षत्रिय है जो राष्ट्र की रक्षा हेतु प्राण देता है, और हर वह व्यक्ति ब्राह्मण है जो अपनी मेधा को धर्म और राष्ट्र के उत्थान हेतु झोंक देता है ।

