*ॐ नमः शिवाय…… भस्म (विभूति) धारण का दिव्य महात्म्य*
*महर्षि दुर्वासा……* *अत्रिमुनि के पुत्ररूप में भगवान् शंकर के अंश से उत्पन्न हुए थे….* अत: *ये रुद्रावतार नाम से भी प्रसिद्ध है। अपने परमाराध्य भगवान् शंकर में इनकी विशेष भक्ति थी।* *ये भस्म एवं रुद्राक्ष धारण किया करते थे। इनका स्वभाव अत्यन्त उग्र था।*
यद्यपि उग्र स्वभाव के कारण इनके शाप से सभी भयभीत रहते थे… *तथापि इनका क्रोध भी प्राणियो-के परम कल्याण के लिये ही होता रहा है । एक समय महर्षि दुर्वासा समस्त भूमण्डल का भ्रमण करते हुए पितृलोक में जा पहुंचे । वे सर्वांग में भस्म रमाये एवं रुद्राक्ष धारण किये हुए थे…….*
*हृदय मे पराम्बा भगवती पार्वती का ध्यान और मुख से ‘जय पार्वती हर’ का उच्चारण करते हुए कमण्डलु तथा त्रिशूल लिये दुर्वासा मुनि ने वहां अपने पितरों का दर्शन किया । इसी समय उनके कानो में करुण क्रन्दन सुनायी पडा…..*
वे पापियों के हाहाकारमय भीषण रुदन को सुनकर कुम्भीपाक, रौरव नरक आदि स्थानों को देखने के लिये दौड़ पड़े । *वहाँ पहुंचकर उन्होंने वहाँ के अधिकारियो से पूछा – रक्षको ! यह करुण क्रन्दन किनका है….? ये इतनी यातना क्यों सह रहे है ….?*
उन्होंने उत्तर दिया- *यह संयमनीपुरी का कुम्भीपाक नामक नरक है। यहां वे ही लोग आकर कष्ट भोगते है, जो शिव, विष्णु, देवी, सूर्य तथा गणेश के निन्दक है और जो वेद पुराण की निन्दा करते है ब्राह्मणोंके द्रोही है और माता, पिता, गुरु तथा श्रेष्ट ज़नो का अनादर करते है, जो धर्मके दूषक है वे पतितजन यहां घोर कष्ट पाते है। उन्ही पतितो का यह महाघोर दारुण शब्द अपको सुनायी दे रहा है..*
यह सुनकर दुर्वासा ऋषि बहुत दुखी हुए और दुखियों को देखने के लिये वे उस कुण्ड के पास गये । *कुण्ड के समीप जाकर ज्यों ही वे सिर नीचा करके देखने लगे त्यों ही वह कुण्ड स्वर्ग के समान सुन्दर हो गया । वहाँ के पापी जीव एकाएक प्रसन्न हो उठे और दु:ख से मुक्त होकर गद्गदस्वर से मधुर भाषण करने लगे । उस समय आकाश से पुष्पवृष्टि होने लगी और विविध समीर चलने लगे । वसन्त ऋतु के समान उस सुखदायी समय मे यमदूतो को भी विस्मय में डाल दिया । स्वयं मुनि भी यह आश्चर्य देखकर बड़े सोच में पड़ गये….*
चकित होकर यमदूतों ने धर्मराज के निकट जाकर इस आश्चर्यमय स्थिति परिवर्तन की सुचना दी और कहा – *महाभाग… बड़े आश्चर्य की बात है कि सभी पापियों को इस समय अपार आनन्द हो गया है, किसी को किसी प्रकार की यम यातना रह ही नहीं गयी । विभो ! यह क्या बात है ?दूतों की यह खात सुनते ही धर्मराज स्वयं वहाँ गये और वहाँ का दृश्य देखकर वे भी बहुत चकित हुए….*
उन्होंने सभी देवताओ को बुलाकर इसका कारण पूछा, परंतु किसी को इसका मूल कारण नहीं ज्ञात हो सका । *जब किसी प्रकार इसका पता न चला, तब ब्रह्मा और विष्णु की सहायता से धर्मराज भगवान् शंकर के पास गये……* पार्वती के साथ विराजमान भगवान् शंकर का दर्शन कर वे स्तुति प्रार्थना करते हुए कहने लगे-
*हे देवदेव…. कुम्मीपाक का कुण्ड एकाएक स्वर्गके समान हो गया, इसका क्या कारण है ? प्रभो ! आप सर्वज्ञ हैं अत: अपकी सेवा में हम आये है । हम लोगोंके संदेह को आप दूर करने की कृपा करे ।*
सर्वान्तर्यामी भगवान् ने गम्भीर स्वर से हंसते हुए कहा – *देवगणो ! इसमें कुछ भी आश्चर्य नहीं है, यह विभूति ( भस्म) का ही माहात्म्य है । जिस समय मेरे परम भक्त दुर्वास मुनि कुम्मीपाक नरक को देखने गये थे, उस समय वायुके वेगसे उनके ललाट से भस्म के कुछ कण उस कुण्डमें गिर पड़े थे । इसी कारण वह नरक स्वर्ग के समान हो गया है और अब वह स्वर्गीय ‘पितृतीर्थ’ के नामसे प्रसिद्ध होगा ।*
*कुम्भीपाकं गतो द्रष्टुं दुर्वासा: शैवसम्मतः।।*
*अवांगमुखो ददर्शाधस्तदा वायुवशाद्धरे ।*
*भाले भस्मकणास्तत्र पतिता दैवयोगतः ।।*
*तेन जातमिदं सर्वं भस्मनो महिमा त्वयम्।*
*इतः परं तु तत्तीर्थं पितृलोकनिवासिनाम्।।*
*भविष्यति न संदेहो यत्र स्नात्वा सुखी भवेत्।*
*(देवीभागवत ११ । १५ ।६४-६७)*
भगवान् शंकर की बात सुनकर धर्मराजसहित सभी देवगण अत्यन्त प्रसन्न हुए । उसी समय उन्होंने उस कुण्ड के समीप शिवलिङ्ग तथा देवी पार्वती की स्थापना की और वहाँ के पापियों को मुक्त कर दिया। *तभी से पितृलोक में उस मूर्ति के दर्शन पूजन करके पितृलोग शिवधाम (मोक्ष) प्राप्त करने लगे । यह चमत्कार परम शैव रुद्रावतार महर्षि दुर्वासा मुनि की शिवभक्ति तथा उनके भालपर विराजमान शिवविभूति(भस्म) का ही था* । (देवीभागवत)
जो ॐ नमः शिवाय इस मन्त्र का उच्चारण करता है, उसका मुख को निश्चय ही तीर्थ दर्शन का फल प्राप्त होता है। *जिसके मुख में ‘शिव’ नाम तथा शरीरपर भस्म और रुद्राक्ष रहता है, उसके दर्शनेसे ही पाप नष्ट हो जाते है । (शिवपुराण. शा. सं.अ ३०)*
*जय महाँकाल*
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